कर दिया ज़ार-ए-ग़म-ए-इश्क़[1] ने ऐसा मुझको
मौत आयी भी तो बिस्तर पे न पाया मुझको
कभी जंगल कभी बस्ती में फिराया मुझको
आह! क्या-क्या न किया इश्क़ ने रुस्वा[2] मुझको
दुश्मन-ए-जाँ हुआ दरपर्दा[3] मेरा जज़्बा-ए-इश्क़[4]
मुँह छुपाने लगे वो जानके शैदा[5] मुझको
रोज़ रौशन हो न क्यूँकर मेरी आँखों में सियाह[6]
है तेरे गेसू-ए-शब-रंग[7] का सौदा[8] मुझको
एक परी-रू[9] की मुहब्बत का मैं हूँ दीवाना
न परी का, न किसी जिन्न का है साया मुझको
रोज़-ओ-शब शोख़ ने क्या-क्या न दिखाए नैरंग[10]
रुख[11] दिखाया कभी गेसू-ए-चलीपा[12] मुझको
दिन भले आए तो अ'अदा[13] सबब-ए-खैर[14] हुए
बद-दुआ ने किया अग्यार[15] के अच्छा मुझको
फ़ख्र से बज़्म-ए-बुताँ[16] में वो कहा करते हैं
प्यार कुछ रोज़ से अब करते हैं 'राना' मुझको
(1. प्रेम में दुःख की अधिकता; 2. बदनाम; 3. अप्रत्यक्ष रूप से; 4. प्रेम का जज़्बा; 5. आशिक़; 6. काला/कालापन; 7. काले बाल; 8. पागलपन/दीवानापन; 9. परी जैसी; 10. जादू; 11. चेहरा; 12. घुँघराले बाल; 13. दुश्मन; 14. ख़ैरियत की वजह; 15. ग़ैर/विरोधी लोग; 16. बुतों की महफ़िल)
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