Monday, August 7, 2017

Ghazal-7

वाह क्या हुस्न, कैसा जोबन है
कैसी अबरू[1] हैं, कैसा चितवन है

जिसको देखो वो नूर का बक़अ[2]
ये परिस्तान[3] है कि लंदन है

अबस[4] उनको मसीह कहते हैं
मार रखने का उनमें लच्छन[5] है

हुस्न दिखला रहा है जलवा-ए-हक़[6]
रू-ए-ताबाँ[7] से साफ़ रौशन है

रस्म उल्टी है ख़ूब-रूयों[8] की
दोस्त जिसके बनो वो दुश्मन है

हाल उश्शाक़[9] को बताते हैं
और अभी ख़ैर से लड़कपन है

(1. भौंहें; 2. घर; 3. परियों के रहने का स्थान; 4. बेकार/फ़िज़ूल में; 5. लक्षण; 6. सच्चाई की तस्वीर; 7. तेजस्वी चेहरा; 8. ख़ूबसूरत लोग; 9. आशिक़)

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