Monday, August 7, 2017

Ghazal-18

ऐ अजल[1] हिज्र[2] की शब है तुझे आना होगा
एक दम[3] के लिए तकलीफ़ उठाना होगा

किस सितमगर से पड़े देखिए दिल को पाला
ताइर-ए-जाँ[4] किसी नावक[5] का निशाना होगा

फिर कभी ऐश के दिन, वस्ल की रातें होंगी
या इलाही, कभी ऐसा भी ज़माना होगा?

वादा-ए-वस्ल[6] किया है वो न आएँगे मगर
कुछ न कुछ मौत के आने का बहाना होगा

तर्क-ए-अस्याँ[7] करो 'राना' कि तुम्हें रोज़-ए-जज़ा[8]
देखना नामा-ए-आमाल[9] दिखाना होगा

(1. मौत; 2. जुदाई; 3. क्षण; 4. प्राण रूपी पक्षी; 5. तीर; 6. मुलाक़ात का वादा; 7. गुनाह करने की आदत छोड़ना; 8. हिसाब-किताब वाले दिन/क़यामत के दिन; 9. कर्मों का लेखा-जोखा)

No comments:

Post a Comment