Monday, August 7, 2017

Ghazal-21

जलवा हर रंग में देखा तेरा गुल-रू[1] पैदा
हर गुल-ए-बाग़-ए-जहाँ[2] से है तेरी बू पैदा

जब हुआ ज़ुल्फ़ के उठने से वो अबरू[3] पैदा
मैं ये समझा कि हुआ मार से बिच्छू पैदा

तुमको दीवाने अगर हम से हज़ारों हैं तो ख़ैर
हम भी कर लेंगे कोई तुम सा परी-रू[4] पैदा

शायद उस पर्दा-नशीं तक भी रसाई[5] हो जाए
पहले दरबाँ[6] से दिला[7] रब्त[8] तो तू कर पैदा

दाम[9] में मुर्ग़-ए-दिल[10] अपना कभी आता न अगर
दाना-ए-ख़ाल[11] न होता तह-ए-गेसू[12] पैदा

जलवा-ए-बर्क़[13] के हमराह बरसता है सहाब[14]
दर्द-ए-दिल ही से हुआ करते हैं आँसू पैदा

न हुआ हश्र[15] में भी बार[16] गिराँ[17] था इतना
मेरे अस्याँ[18] के लिए कोई तराज़ू पैदा

क़तअ[19] कब तक न करूँ दिल से उमीद-ए-वस्लत[20]
हीला[21] करता है नया रोज़ जफ़ा-जू[22] पैदा

हक़-ओ-बातिल[23] में दिला अर्ज़-ओ-समा[24] का है फ़र्क़
क्या करे मर्तबा[25] ऐजाज़[26] का जादू पैदा

बात कुछ होगी शगुफ़्ता[27] करो ऐ ग़ुन्चा-दहन[28]
गुल के खिलने से हुआ करती है ख़ुश-बू पैदा

फेंक दी मय वहीँ साक़ी ने समझकर कफ़-ए-बार[29]
जाम-ए-मय में जो हुआ साया-ए-गेसू[30] पैदा

(1. फूल जैसे चेहरे वाला; 2. दुनिया के बागों के फूल; 3. भौहें; 4. परी जैसी शक्ल-ओ-सूरत; 5. पहुँच; 6. दरबान; 7. दिल; 8. संबंध/ताल्लुक़; 9. क़ैद/जाल; 10. दिल रूपी पक्षी; 11. बारीक तिल; 12. बालों के लटों के नीचे/माथे पर; 13. बिजली की लहर; 14. बादल; 15. क़यामत; 16. वज़न/भार; 17. भारी; 18. गुनाह; 19. तोड़ना/विच्छेद करना; 20. मुलाक़ात की उम्मीद; 21. बहाना; 22. बे-वफ़ाई करने का तरीक़ा ढूँढने वाला; 23. सही और ग़लत; 24. ज़मीन और आसमान; 25. पद/स्थान; 26. करिश्मा/चमत्कार; 27. खिला हुआ चेहरा/मुस्कराना; 28. कलियों जैसे चेहरे वाला; 29. भारी हाथ; 30. बालों की लट का साया)

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