Monday, August 7, 2017

Ghazal-15

दाग़ों से बाग़-ए-दिल[1] में है आलम बहार का
क्या इश्क़ गुल खिलाता है उस गुल-इज़ार[2] का

हैरत में आके मानी-ओ-बहज़ाद[3] रह गए
नक्शा किसी से खिंच न सका उस निगार[4] का

सीमाब[5] है ख़्याल-ए-रुख़-ए-आतिशीं[6] में ये
मुमकिन नहीं क़रार दिल-ए-बे-क़रार[7] का

नैरंग-ए-जहाँ[8] से है गहे[9] वस्ल[10] गह फ़िराक़[11]
क्या रंग है दो-रंगी-ए-लैल-ओ-नहार[12] का

आशिक़ ये इश्क़-ए-सरू-क़द-ए-यार[13] में है महव[14]
सीधा लिया है रास्ता मुजरिम ने दार[15] का

शीरीं के दर को छोड़ के क्या दिल में आएगी
रस्ता जो कोहकन[16] ने लिया कोहसार[17] का

हाथों में नाज़ुकी से सँभलती नहीं जो तेग़[18]
है इसमें क्या गुनाह तेरे जाँ-निसार[19] का

दुनिया से ग़ैर-ए-इश्क़[20] गया कौन मेरे साथ
ममनून[21] हूँ मज़ार में इस यार-ए-ग़ार[22] का

फूला नहीं समाता हूँ शादी[23] से इसलिए
बोसा मिला है आज किसी गुल-इज़ार का

आईना साँ ख़ुदा ने बनाया है दिल को साफ़
दिल में हमारे नाम नहीं है ग़ुबार[24] का

फिर मुर्ग़-ए-दिल[25] ने अपने किए बाल-ओ-पर[26] दुरुस्त
'राना' क़रीब आया है मौसम बहार का

(1. दिल के बाग़; 2. एक फूल का नाम; 3. मानी और बहज़ाद ईरान के दो ऐतिहासिक और मशहूर चित्रकार थे; 4. प्यारी सूरत; 5. पारा; 6. तेजस्वी चेहरे का ख्याल; 7. बे-क़रार दिल; 8. दुनिया का जादू; 9. कभी/गाह/गह/गहे; 10. मुलाक़ात; 11. जुदाई; 12. दिन और रात के दो अलग-अलग रंग के होने का गुण; 13. सरू के पेड़ की तरह सीधा प्रेम; 14. खोया हुआ; 15. घर/ठिकाना; 16. पहाड़ खोदने वाला/'फ़रहाद'; 17. पर्वत श्रंखला; 18. तलवार; 19. जान न्यौछावर करने वाला; 20. इश्क़ के सिवा; 21. अहसानमंद; 22. क़ब्र में साथी; 23. ख़ुशी; 24. धूल/गंदगी; 25. दिल रूपी पक्षी; 26. बाल और पर)

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