छूट कर दाम[1] से गुलज़ार[2] में नाशाद[3] रहा
रोज़ बुलबुल को ख़्याल-ए-रुख़-ए-सय्याद[4] रहा
क्या कहूँ हिज्र[5] में दिल पर मेरे क्या-क्या गुज़री
रात भर मशग़ला-ए-नाला-ओ-फ़रियाद[6] रहा
जोर[7] भी तूने किए वादा-ख़िलाफ़ी के सिवा
इक नया रोज़ सितम-ओ-सितम ईजाद रहा
काट अबरू[8] का कहाँ तेग़-ए-सफ़ाहानी[9] में
बर्क़[10] के सामने क्या रुतबा-ए-फ़ौलाद[11] रहा
ज़िन्दगानी में तो अग्यार[12] तलक थे सब यार
पर लहद[13] में मेरे हमराह न हमज़ाद[14] रहा
फ़स्ल-ए-गुल[15] ख़त्म हुई आई ख़िज़ाँ[16] ऐ 'राना'
अब न गुलज़ार में गुलचीं[17] है न सय्याद[18] रहा
(1. क़ैद/जाल; 2. बाग़; 3. दुखी/परेशान; 4. शिकारी के चेहरे का ख्याल; 5. जुदाई; 6. विलाप करना और फ़रियाद करना; 7. ज़ुल्म; 8. भौंहें; 9. ; 10. बिजली की लहर; 11. लोहे का रुतबा; 12. गैर लोग; 13. क़ब्र; 14. तलवार; 15. फूलों का मौसम; 16. पतझड़; 17. फूल तोड़ने वाला/माली; 18. शिकारी)
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