Monday, August 7, 2017

Ghazal-17

है जुड़ाव वो तेरे हाथ में जानी छल्ला
हूर के पास भी जिसका नहीं सानी छल्ला

कुछ तो तस्कीं[1] हो मुझे तुम नहीं आते हो अगर
भेज दो बहर-ए-ख़ुदा[2] जल्द निशानी छल्ला

याद-ए-जानाँ[3] में शब-ए-हिज्र[4] गुज़र जाती है
जी के बहलाने को है अब तो कहानी छल्ला

हिर्ज़-ए-जाँ[5] उसको करूँ तान्हूँ[6] अंगुश्त-नुमा[7]
ये वो छल्ला है कि जिसका नहीं सानी छल्ला

याद दिलवा के तुम्हें रोज़ रुला देता है
चश्म-ए-'राना'[8] से बहा देता है पानी छल्ला

(1. सुकून; 2. ख़ुदा के लिए; 3. प्रियतमा की याद; 4. जुदाई की रात; 5. जान का तावीज़; 6. पहनूँ; 7. ऊँगली में; 8. 'राना' की आँखें)

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