Monday, August 7, 2017

Mirza Ghalib's letter in the name of Munshi Nawal Kishore of awadh akhbaar talking about Nawab Mardan Ali Khan Rana Moradabadi Sept. 1864

Ghalib's letter in the name of munshi nawal kishore of awadh akhbaar talking about Nawab Mardan Ali Khan Rana Moradabadi Sept. 1864  page-1

Ghalib's letter in the name of munshi nawal kishore of awadh akhbaar talking about Nawab Mardan Ali Khan Rana Moradabadi Sept. 1864  page-2

Two Letters of Mirza Ghalib in the name of Nawab Mardan Ali Khan 'Rana'

Two Letters of Mirza Ghalib in the name of Mardan Ali Khan Rana Moradabadi(page 52-53 of the book khutuut-e-ghalib)
detailed description of the two Letters of Mirza Ghalib in the name of Mardan Ali Khan Rana Moradabadi1

detailed description of the two Letters of Mirza Ghalib in the name of Mardan Ali Khan Rana Moradabadi2


Two Letters of Mirza Ghalib in the name of Mardan Ali Khan Rana Moradabadi

Brief Biography of Nawab Mardan Ali Khan 'Rana'

नाम: नवाब मरदान अली ख़ान 'राना'

जन्म स्थान: मुरादाबाद, उत्तर प्रदेश

मृत्यु: 2 जून, 1879 (श्रीनगर, कश्मीर)

उपनाम: मुज़्तर, राना, निज़ाम

इनके उस्ताद: मिर्ज़ा ग़ालिब, मुंशी मुज़फ्फ़र अली ख़ान 'असीर' लखनवी

प्रमुख कृतियाँ:

कुल्लियात-ए-निज़ाम(शायरी संग्रह)(दिसम्बर 1875);

ज़ब्त-ए-इश्क़(वासोख्त संग्रह)(1865)(मुंशी नवल किशोर प्रेस, लखनऊ);

मेहर-ए-नबूवत(नातिया संग्रह)(मुंशी नवल किशोर प्रेस, लखनऊ);

ग़ुन्चा-ए-राग(संगीत)(1863)(मुंशी नवल किशोर प्रेस, लखनऊ);

नग़मा-ए-सनम(संगीत)(पंजाबी प्रेस);

नवा-ए-ग़रीब(भागौलिक विज्ञान)(1879)(मुंशी नवल किशोर प्रेस, लखनऊ);

तारीख़-उल-बिलाद(इतिहास)(1861);

तवारीख़ राज मारवाड़(इतिहास)(1869);

ज़िल-ए-नासिरी(इल्म-ए-जफ़्र)(1865)(बनाम शाह-ए-ईरान);

जफ़्र-ए-जामा(इल्म-ए-जफ़्र);

जफ़्र-ए-कबीर(इल्म-ए-जफ़्र);

तिलिस्म-ए-नज़र(हिप्नोटिस्म)(1872);

सीर-ए-ग़ायत(हिप्नोटिस्म)(1866);

मुक़दमा रदकद मुलाज़िमत(अख़बारों और इनको लिखे ख़तों का संग्रह)(1865)(मुंशी नवल किशोर प्रेस, लखनऊ).

इतिहास की मशहूर अंग्रेजी किताब "टॉड राजस्थान" का उर्दू तर्जुमा.

इन पर लिखे गए क़सीदों की किताब "क़साइद-ए-मदहिया-निज़ाम"(मुंशी ग़ुलाम मुहम्मद ख़ान 'तपिश')(1871)(मुंशी नवल किशोर प्रेस, लखनऊ)

मुंशी फ़िदा अली 'ऐश' ने 1869 में कई शोअरा की वासोख्त इकठ्ठा करके एक किताब "शोला-ज्वाला"(लखनऊ) के नाम से दो खण्डों में छापी, जिनमें से दूसरे खंड में मरदान अली ख़ान की वासोख्त भी शामिल हैं.

जीवन परिचय: नवाब मरदान अली ख़ान का जन्म उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद ज़िले के भट्टी मुहल्ला के एक प्रतिष्ठित परिवार में हुआ था. ये यूसुफ़ज़ई पठान थे. इनके बुज़ुर्ग मुग़ल सल्तनत और अवध रियासत में अच्छे पदों पर रहे. इनकी अरबी-फ़ारसी की शिक्षा घर पर ही हुई. 1850 में रावलपिंडी में सरकारी पद पर आसीन हुए. लेकिन नौकरी से ख़ुश नहीं थे, सो 1858 में इन्होने नौकरी से इस्तीफ़ा दे दिया. लगभग एक साल बाद मालेरकोटला चले गए, जहाँ नवाब साहब ने इन्हें वज़ीर-ए-आज़म नियुक्त किया. इसके बाद कपूरथला चले गए जहाँ कुछ समय बाद वहाँ के महाराजा शिवदान सिंह ने उन्हें "निज़ामुद्दौला मुन्तज़िम उल मुल्क नवाब मुहम्मद मरदान अली ख़ान बहादुर तख़्त क़ायम जंग" का ख़िताब दिया और मारवाड़ का वज़ीर-ए-आज़म नियुक्त किया. 1876 में सभी पदों से इस्तीफ़ा देकर ये हज करने चले गए. समस्त जीवन अविवाहित रहे. 2 जून, 1879 को श्रीनगर(कश्मीर) में इनका इन्तेक़ाल हुआ और फिर वहीँ दफ़न किए गये.
अपने समय में इन्होने कई प्रमुख सड़कें बनवायीं और टकसाल(सरकारी सिक्के बनाने के कारखाने) क़ायम किए. नयी-नयी चीज़ें खोजना इन्हें बहुत पसंद था. अपने वक़्त में इन्होने कई क़ीमती और दुर्लभ पत्थर खोजे. इसके अलावा मारवाड़ की दीवानी के ज़माने में भी कई चीज़ें खोजीं, जिनमें चाँदी, लोहा, मिस प्रमुख हैं.
ये बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे. इन्होने शायरी के अलावा संगीत, भागौलिक विज्ञान, इतिहास, तिलिस्मी ज्ञान, हिप्नोटिस्म आदि पर भी कई किताबें लिखीं. हिप्नोटिस्म पर लिखी इनकी किताबें 'तिलिस्म-ए-नज़र' और 'सीर-ए-ग़ायत' अपने आप में उर्दू की शायद पहली किताबें हैं(बक़ौल मालिक राम जी).
शायरी में मिर्ज़ा ग़ालिब से इस्लाह लेते थे. ग़ालिब के इन्तेक़ाल के बाद इन्होने मुंशी मुज़फ्फ़र अली 'असीर' लखनवी, जो अमीर मिनाई के उस्ताद थे, से इस्लाह ली.
इनके नाम मिर्ज़ा ग़ालिब के दो ख़त भी 'ख़ुतूत-ए-ग़ालिब' में मौजूद हैं, जिनमें ग़ालिब ने इनके कलाम की तारीफ़ करते हुए कहा-"आज इस हुनर में तुम यक्ता(अद्वितीय) हो". इसके अलावा एक ख़त अवध प्रेस के संपादक के नाम भी है जिसमें मिर्ज़ा ग़ालिब ने मरदान अली ख़ान की बहादुरी का ज़िक्र किया है जब इन्होने एक शेर को पकड़ा था.
अतिया बेगम भारतीय संगीत की एक बेहद मशहूर विदुषी गुज़री हैं, उन्होंने 1942 में छपी अपनी एक मशहूर किताब "संगीत ऑफ़ इंडिया" में पेज नंबर-8 पर मरदान अली ख़ान की संगीत विषय पर लिखी किताब "ग़ुन्चा-ए-राग"(संगीत)(1863)(मुंशी नवल किशोर प्रेस, लखनऊ) का ज़िक्र किया है.
मिर्ज़ा ग़ालिब पर शोध करने वाले मशहूर विद्वान् मलिक राम जी ने भी अपनी किताब "तलामिज़ा-ए-ग़ालिब" में ग़ालिब के शागिर्दों में पेज नंबर 281 से 284 तक इनका ज़िक्र किया है.

[रेफ़रेन्स: "तलामिज़ा-ए-ग़ालिब"(पेज नंबर 281 से 284)- मलिक राम साहब; कुल्लियात-ए-निज़ाम(तअर्रुफ़)]

इन्होने उर्दू और फ़ारसी दोनों ही में शायरी की. इन्होने प्रमुख रूप से ग़ज़ल, नज़्म, हम्द, नात, सलाम, मनक़बत, वासोख़्त, मुख़म्मस, क़सीदे, रुबाई, सेहरा आदि विधाओं में शायरी की.
इन्होने अपनी शायरी में सबसे पहले 'मुज़्तर' तख़ल्लुस(उपनाम) इस्तेमाल किया, फिर इसके बाद 'राना' तख़ल्लुस कर लिया जो कि इनकी ज़्यादातर ग़ज़लों में मिलता है. फिर निज़ामुद्दौला की उपाधि मिलने के बाद 'निज़ाम' तख़ल्लुस अपनाया. इस बात को इन्होंने अपनी एक रुबाई में समझाया है:

आग़ाज़-ए-सुख़नवरी में 'मुज़्तर' था नाम
'राना' था शबाब-ए-शायरी के हंगाम
है ज़ेर-ए-नगीं जो किश्वर-ए-नज़्म तो अब
नवाब ख़िताब और तख़ल्लुस है 'निज़ाम'   
[कुल्लियात-ए-निज़ाम (पेज-1)] 

(आग़ाज़-ए-सुख़नवरी - शायरी की शुरुआत; शबाब-ए-शायरी - शायरी का चरम; हंगाम - समय; ज़ेर-ए-नगीं - ज़िम्मेदारी; किश्वर-ए-नज़्म - मुख्य प्रशासक; तख़ल्लुस - उपनाम)

इनकी शायरी में मिर्ज़ा ग़ालिब और असीर लखनवी दोनों ही उस्तादों का प्रभाव नज़र आता है. प्रमुखतः इनकी शायरी रूमानी, सूफ़ियाना और रिवायती है, जिसमें मुहावरे व कहावतें भरपूर मात्रा में हैं, साथ ही अलग-अलग उपमाओं का भी ख़ूबसूरती के साथ प्रयोग किया है, जिससे अशआर अति-प्रवाहमय और बेहद आकर्षक जान पड़ते हैं. 
इसके अलावा इन्होने अपने समय की शायरी की रिवायतों को तोड़ते हुए हिंदी और ख़ासकर अंग्रेज़ी के शब्दों का भी ख़ूब प्रयोग किया है जो कि इनकी शायरी को अनूठा-अद्वितीय बनाता है. उदहारण के तौर पर:

खींचा है अक्स क़ल्ब की "फ़ोटोग्राफ़" में
शीशे में है शबीह, परी कोहक़ाफ़ में         
[कुल्लियात-ए-निज़ाम (पेज-26)] 


(अक्स - प्रतिबिम्ब; क़ल्ब - दिल; शबीह - शक्ल; कोहक़ाफ़ - परियों का घर)



50 muntaKhab ash'aar of Mardan Ali Khan 'Rana'





1.     [कुल्लियात-ए-निज़ाम (पेज-2)] 

मैं शौक़-ए-वस्ल में क्या रेल पर शिताब आया
कि सुबह हिन्द में था, शाम पंज-आब आया

(शौक़-ए-वस्ल - मुलाक़ात की ख़ुशी; शिताब - तेज़ी से/झट-पट; पंज-आब - पंजाब)


2.     [कुल्लियात-ए-निज़ाम (पेज-26)]

खींचा है अक्स क़ल्ब की "फ़ोटोग्राफ़" में
शीशे में है शबीह, परी कोहक़ाफ़ में 

(अक्स - प्रतिबिम्ब; शबीह - शक्ल; कोहक़ाफ़ - परियों का घर)

3.     [कुल्लियात-ए-निज़ाम (पेज-2)]

हुआ यकीं कि ज़मीं पर है आज चाँद-गहन
वो माह चेहरे पे जब डाल कर नक़ाब आया

(चाँद-गहन - चन्द्रग्रहण; माह - चाँद)

4.     [कुल्लियात-ए-निज़ाम (पेज-6)]

हाथों में नाज़ुकी से सँभलती नहीं जो तेग़
है इसमें क्या गुनाह तेरे जाँ-निसार का

(तेग़ - तलवार)

5.     [कुल्लियात-ए-निज़ाम (पेज-11)]

तुमको दीवाने अगर हम से हज़ारों हैं तो ख़ैर
हम भी कर लेंगे कोई तुम सा परी-रू पैदा

(परी-रू - परी जैसी शक्ल-ओ-सूरत वाली)

6.     [कुल्लियात-ए-निज़ाम (पेज-13)]

तेरे आते ही देख राहत-ए-जाँ
चैन है, सब्र है, क़रार है आज

7.     [कुल्लियात-ए-निज़ाम (पेज-14)]

कहना क़ासिद कि उसके जीने का
वादा-ए-वस्ल पर मदार है आज

(क़ासिद - डाकिया; मदार - निर्भरता)

8.     [कुल्लियात-ए-निज़ाम (पेज-20)]

ख़ुद ग़लत है जो कहे होती है तक़दीर ग़लत
कहीं क़िस्मत की भी हो सकती है तहरीर ग़लत

(तहरीर - लिखा हुआ)

9.     [कुल्लियात-ए-निज़ाम (पेज-29)]

बदन में ज़ख़्म नहीं बद्धियाँ हैं फूलों की
हम अपने दिल में इसी को बहार जानते हैं

(बद्धियाँ - चोट के निशान)

10.    [कुल्लियात-ए-निज़ाम (पेज-31)]

ख़ुदारा बहर-ए-इस्तक़बाल जल्द ऐ जान बाहर आ
अयादत को मेरी जान-ए-जहाँ तशरीफ़ लाते हैं

(ख़ुदारा - ख़ुदा के लिए; बहर-ए-इस्तक़बाल - स्वागत के लिए; अयादत - हाल-चाल पूछने को)

11.    [कुल्लियात-ए-निज़ाम (पेज-32)]

ग़म सिवा इश्क़ का मआल नहीं
कौन दिल है जो पाएमाल नहीं

(मआल - अंजाम; पाएमाल - उजड़ा हुआ)

12.    [कुल्लियात-ए-निज़ाम (पेज-37)]

ना-उमीद एहल-ए-ख़राबात नहीं रहमत से
बख़्श देगा वो करीम अपने गुनाहगारों को

(एहल-ए-ख़राबात - बुरी आदतों वाले लोग; रहमत - कृपा; करीम - कृपा करने वाला)

13.    [कुल्लियात-ए-निज़ाम (पेज-37)]

अबरू आँचल में दुपट्टे के छुपाना है बजा
तुर्क क्या म्यान में रखते नहीं तलवारों को

(अबरू - भौहें; बजा - उचित; तुर्क - सिपाही)

14.    [कुल्लियात-ए-निज़ाम (पेज-40)]

उठाया उसने बीड़ा क़त्ल का कुछ दिल में ठाना है
चबाना पान का भी खूँ बहाने का बहाना है

(खूँ - ख़ून)

15.    [कुल्लियात-ए-निज़ाम (पेज-40)]

हमारे मर्ग पे शादी अबस अग्यार करते हैं
जहाँ से रफ़्ता-रफ़्ता एक दिन उनको भी जाना है

(मर्ग - मौत; शादी - ख़ुशी; अबस - व्यर्थ ही/फ़िज़ूल में; अग्यार - ग़ैर लोग/विरोधी; जहाँ - दुनिया)

16.    [कुल्लियात-ए-निज़ाम (पेज-41)]

दर्द-ए-सर है तेरी सब पंद-ओ-नसीहत नासेह
छोड़ दे मुझको ख़ुदा पर, न कर अब सर ख़ाली

(पंद-ओ-नसीहत - नसीहतें; नासेह - नसीहत करने वाला/समझाने वाला)

17.    [कुल्लियात-ए-निज़ाम (पेज-41)]

जिसको देखो वो नूर का बक़अ
ये परिस्तान है कि लंदन है

(बक़अ - घर)

18.    [कुल्लियात-ए-निज़ाम (पेज-41)]

रस्म उल्टी है ख़ूब-रूयों की
दोस्त जिसके बनो वो दुश्मन है

(ख़ूब-रूयों - ख़ूबसूरत लोग)

19.    [कुल्लियात-ए-निज़ाम (पेज-43)]

दिल को लगाऊँ और से मैं तुमको छोड़ दूँ
फ़िक़रा है ये रक़ीब का और झूठ बात है

(फ़िक़रा - धोखा; रक़ीब - विरोधी)

20.    [कुल्लियात-ए-निज़ाम (पेज-44)]

हिज्र-ए-जानाँ में जी से जाना है
बस यही मौत का बहाना है

(हिज्र-ए-जानाँ - प्रियतमा से जुदाई)

21.    [कुल्लियात-ए-निज़ाम (पेज-46)]

हो गिरेबाँ का चाक ख़ाक रफ़ू
तार हाथ आए जब न दामन से

22.    [कुल्लियात-ए-निज़ाम (पेज-46)]

न निकली हसरत-ए-दिल एक भी हज़ार अफ़सोस
अदम से आए थे क्या-क्या हम आरज़ू करते

(अदम - non existance)

23.    [कुल्लियात-ए-निज़ाम (पेज-46)]

हर दम दम-ए-आख़िर है, अजल सर पे खड़ी है
दम भर भी हम इस दम का भरोसा नहीं करते

(अजल - मौत)

24.    [कुल्लियात-ए-निज़ाम (पेज-47)]

फ़ुर्क़त की रात वस्ल की शब का मज़ा मिला
पहरों ख़्याल-ए-यार से बातें किया किए

25.    [कुल्लियात-ए-निज़ाम (पेज-48)]

तुम हो मुझसे हज़ार मुस्तग़नी
दिल नहीं मेरा यार मुस्तग़नी

(मुस्तग़नी - बेपरवाह)

26.    [कुल्लियात-ए-निज़ाम (पेज-52)]

ले क़ज़ा एहसान तुझपर कर चले
हम तेरे आने से पहले मर चले

27.    [कुल्लियात-ए-निज़ाम (पेज-55)]

ये रक़ीबों की है सुख़न-साज़ी
बे-वफ़ा आप हों, ख़ुदा न करे

(सुख़न-साज़ी - बातें बनाना)

28.    [कुल्लियात-ए-निज़ाम (पेज-58)]

दुनिया में कोई इश्क़ से बदतर नहीं है चीज़
दिल अपना मुफ़्त दीजिए, फिर जी से जाइए

29.    [कुल्लियात-ए-निज़ाम (पेज-59)]

हरदम ये दुआ माँगते रहते हैं ख़ुदा से
अल्लाह बचाए शब-ए-फ़ुर्क़त की बला से

30.    [कुल्लियात-ए-निज़ाम (पेज-61)]

हरजाईयों के इश्क़ ने क्या-क्या किया ज़लील
रुस्वा रहे, ख़राब रहे, दर-ब-दर रहे

31.    [कुल्लियात-ए-निज़ाम (पेज-62)]

पड़ा हूँ मैं यहाँ और दिल वहीँ है
इलाही! मैं कहीं हूँ, वो कहीं है

32.    [कुल्लियात-ए-निज़ाम (पेज-62)]

बदन पर बार है फूलों का साया
मेरा महबूब ऐसा नाज़नीं है

33.    [कुल्लियात-ए-निज़ाम (पेज-63)]

क्यूँकर बढ़ाऊँ रब्त न दरबान-ए-यार से
आख़िर कोई तो मिलने की तदबीर चाहिए

34.    [कुल्लियात-ए-निज़ाम (पेज-65)]

लबों पे जान है, एक दम का और मेहमाँ है
मरीज़-ए-इश्क़-ओ-मुहब्बत का तेरे हाल ये है

35.    [कुल्लियात-ए-निज़ाम (पेज-65)]

जो चीज़ है जहान में वो बेमिसाल है
हर फ़र्द-ए-ख़ल्क़ वहदत-ए-हक़ पर दलील है

36.    [कुल्लियात-ए-निज़ाम (पेज-67)]

राह-ए-उल्फ़त में मुलाक़ात हुई किस-किस से
दश्त में कैस मिला, कोह में फ़रहाद मुझे

37.    [कुल्लियात-ए-निज़ाम (पेज-68)]

मरज़-ए-इश्क़ को शिफ़ा समझे
दर्द को दर्द की दवा समझे

38.  [कुल्लियात-ए-निज़ाम (पेज-68)]

दिया वो जो न था वहम-ओ-गुमाँ में
भला मैं और क्या मांगूँ ख़ुदा से

39.   [कुल्लियात-ए-निज़ाम (पेज-69)]

जिसको सब कहते हैं समंदर है
क़तरा-ए-अश्क-ए-दीदा-ए-तर है

40.    [कुल्लियात-ए-निज़ाम (पेज-72)]

प्यार की बातें कीजे साहब
लुत्फ़ सोहबत का गुफ़्तगू से है

41.    [कुल्लियात-ए-निज़ाम (पेज-72)]

न पूछो हम-सफ़रो मुझसे माजरा-ए-वतन
वतन है मुझपे फ़िदा और मैं फ़िदा-ए-वतन

42.    [कुल्लियात-ए-निज़ाम (पेज-73)]

आख़िर हुआ है हश्र बपा इंतेज़ार में
सुबह-ए-शब-ए-फ़िराक़ हुई मारवाड़ में


43.    [कुल्लियात-ए-निज़ाम (पेज-73)]

की रिया से न शेख़ ने तौबा
मर गया वो गुनाहगार अफ़सोस

44.    [कुल्लियात-ए-निज़ाम (पेज-74)]

ख़ाक भी लुत्फ़-ए-ज़िन्दगी न रहा
आरज़ू जी में हो वो जी न रहा

45.    [कुल्लियात-ए-निज़ाम (पेज-74)]

न आयी बात तक भी मुँह पे रौब-ए-हुस्न-ए-जानाँ से
हज़ारों सोच कर मज़मून हम दरबार में आए

46.    [कुल्लियात-ए-निज़ाम (पेज-74)]

खो गया कू-ए-दिलरुबा में 'निज़ाम'
लोग कहते हैं मारवाड़ में है

47.    [कुल्लियात-ए-निज़ाम (पेज-74)]

रेल पर यार आएगा शायद
मिज़्दा-ए-वस्ल आज तार में है

(मिज़्दा-ए-वस्ल - मुलाक़ात की ख़ुशख़बरी; तार - टेलीग्राम)

48.    [कुल्लियात-ए-निज़ाम (पेज-74)]

अश्क-ए-हसरत दीदा-ए-दिल से हैं जारी इन दिनों
कार-ए-तूफाँ कर रही है अश्क-बारी इन दिनों

49.    [कुल्लियात-ए-निज़ाम (पेज-75)]

दीवार-ए-तन को देख के 'राना' यकीं हुआ
बस दरमियाँ यही है अदम और वजूद में

50.    [कुल्लियात-ए-निज़ाम (पेज-75)]

माल-ए-दुनिया को न मुतलक़ जाना
ख़ूब मरदान अली खाँ समझे


Ghazal-22

आम अगर सिलसिला-ए-ज़ुल्फ़-ए-मअनबर[1] होता
फिर न ख़ाली कभी सौदे[2] से कोई सर होता

कोई आशिक़ भी न इस इश्क़ से जाँ-बर[3] होता
तुझ सा बे-रहम ज़माने में जो दिलबर होता

ऐ बुत-ए-पर्दा-नशीं[4] शोहरा-ए-आफ़ा[5] है तू
क्यूँ तेरे हुस्न का मज़कूर[6] न घर-घर होता

हिज्र-ए-महबूब[7] में क्या-क्या न अज़ीयत[8] खींची
मौत आ जाती तो इस ज़ीस्त[9] से बेहतर होता

देखता सूरत-ए-आईना[10] जो उसका न जमाल[11]
शश-जिहत[12] में न कभी आके मैं शशदर[13] होता

रहम आया न उसे वरना मेरे नालों[14] से
पानी हो जाता वहीँ कैसा ही पत्थर होता

देख ले ज़ुल्फ़-ए-परी-रू[15] को तो क़ायल[16] हो जाए
जो ये समझा है परी के नहीं शहपर[17] होता

नौ-गिरफ़्तार-ए-ग़म-ए-हिज्र[18] ने दी जाँ आख़िर
क्यूँ ये मरता जो ग़म-ओ-दर्द[19] का ख़ू-गर[20] होता

मेरे मरने की ख़बर सुनके कहा जानाँ[21] ने
मरज़-ए-इश्क़[22] से कोई नहीं जाँ-बर[23] होता

कोहकन[24] कोहकनी[25] जाके न करता हरगिज़
हक़ में उसके दिल-ए-शीरीं[26] जो न पत्थर होता

मोतियों का है जबीं[27] पर तेरी छपका[28] इस तरह
जिस तरह माह[29] है परवीं[30] के बराबर होता

कुछ बसर और भी अरमानों में कर लेते 'निज़ाम'
उम्र भर में भी अगर वस्ल[31] मयस्सर[32] होता

(1. ख़ुशबूदार ज़ुल्फ़ों का सिलसिला; 2. पागलपन; 3. सलामत/ज़िन्दा; 4. पर्दानशीन प्रियतमा; 5. दुनिया भर में मशहूर; 6. ज़िक्र; 7. प्रियतमा से जुदाई; 8. दुःख/तकलीफ़; 9. ज़िन्दगी; 10. आईने की तरह; 11. सौन्दर्य; 12. छः पहलुओं वाला/षटकोण की सी आकृति का (शीशे का कमरा); 13. हैरान/दुविधा में; 14. विलाप; 15. परी जैसी की ज़ुल्फ़ें; 16. प्रभावित; 17. पंख; 18. जुदाई के ग़म का नया-नया मारा हुआ; 19. ग़म और दर्द; 20. आदी; 21. प्रियतमा; 22. इश्क़ की बीमारी; 23. महफ़ूज़/सलामत/ज़िन्दा; 24. पहाड़ खोदने वाला/'फ़रहाद'; 25. पहाड़ खोदना; 26. 'शीरीं' का दिल; 27. माथा/पेशानी; 28. माथे पे डाला जाने वाला गोल आकार का एक गहना; 29. चाँद; 30. सात सितारों का झुरमुट; 31. मिलन/मुलाक़ात; 32. उपलब्ध/आसानी से मिलना)

Ghazal-21

जलवा हर रंग में देखा तेरा गुल-रू[1] पैदा
हर गुल-ए-बाग़-ए-जहाँ[2] से है तेरी बू पैदा

जब हुआ ज़ुल्फ़ के उठने से वो अबरू[3] पैदा
मैं ये समझा कि हुआ मार से बिच्छू पैदा

तुमको दीवाने अगर हम से हज़ारों हैं तो ख़ैर
हम भी कर लेंगे कोई तुम सा परी-रू[4] पैदा

शायद उस पर्दा-नशीं तक भी रसाई[5] हो जाए
पहले दरबाँ[6] से दिला[7] रब्त[8] तो तू कर पैदा

दाम[9] में मुर्ग़-ए-दिल[10] अपना कभी आता न अगर
दाना-ए-ख़ाल[11] न होता तह-ए-गेसू[12] पैदा

जलवा-ए-बर्क़[13] के हमराह बरसता है सहाब[14]
दर्द-ए-दिल ही से हुआ करते हैं आँसू पैदा

न हुआ हश्र[15] में भी बार[16] गिराँ[17] था इतना
मेरे अस्याँ[18] के लिए कोई तराज़ू पैदा

क़तअ[19] कब तक न करूँ दिल से उमीद-ए-वस्लत[20]
हीला[21] करता है नया रोज़ जफ़ा-जू[22] पैदा

हक़-ओ-बातिल[23] में दिला अर्ज़-ओ-समा[24] का है फ़र्क़
क्या करे मर्तबा[25] ऐजाज़[26] का जादू पैदा

बात कुछ होगी शगुफ़्ता[27] करो ऐ ग़ुन्चा-दहन[28]
गुल के खिलने से हुआ करती है ख़ुश-बू पैदा

फेंक दी मय वहीँ साक़ी ने समझकर कफ़-ए-बार[29]
जाम-ए-मय में जो हुआ साया-ए-गेसू[30] पैदा

(1. फूल जैसे चेहरे वाला; 2. दुनिया के बागों के फूल; 3. भौहें; 4. परी जैसी शक्ल-ओ-सूरत; 5. पहुँच; 6. दरबान; 7. दिल; 8. संबंध/ताल्लुक़; 9. क़ैद/जाल; 10. दिल रूपी पक्षी; 11. बारीक तिल; 12. बालों के लटों के नीचे/माथे पर; 13. बिजली की लहर; 14. बादल; 15. क़यामत; 16. वज़न/भार; 17. भारी; 18. गुनाह; 19. तोड़ना/विच्छेद करना; 20. मुलाक़ात की उम्मीद; 21. बहाना; 22. बे-वफ़ाई करने का तरीक़ा ढूँढने वाला; 23. सही और ग़लत; 24. ज़मीन और आसमान; 25. पद/स्थान; 26. करिश्मा/चमत्कार; 27. खिला हुआ चेहरा/मुस्कराना; 28. कलियों जैसे चेहरे वाला; 29. भारी हाथ; 30. बालों की लट का साया)

Ghazal-20

नाम मशहूर-ए-ख़ास-ओ-आम[1] हुआ
इश्क़ में ख़ूब मेरा नाम हुआ

दिल में अब दर्द का मक़ाम हुआ
हिज्र[2] में काम ही तमाम हुआ

पुख़्ता-मग़ज़ों[3] पे तोहमत[4] ऐ नासेह[5]
आपको क्या ख़्याल-ए-ख़ाम[6] हुआ

ख़त ग़ुलामी का लीजिए साहब
बोसा-ए-ख़त[7] पे मैं ग़ुलाम हुआ

चौंक उठे ख़फ़्तगान-ए-ख़्वाब-ए-अदम[8]
जब ख़िरामाँ[9] वो ख़ुश-ख़िराम[10] हुआ

हिज्र में दम निकल गया 'राना'
लो ये क़िस्सा ही अब तमाम हुआ

(1. आम और ख़ास लोगों में मशहूर; 2. जुदाई; 3. समझदार लोग; 4. इल्ज़ाम; 5. समझाने वाला/नसीहत करने वाला; 6. ग़लत ख्याल; 7. गाल पर बोसा; 8. गहरी नींद में ख़्वाब में डूबे हुए; 9. टहलना; 10. ख़ूबसूरत चाल वाला)