Monday, August 7, 2017

Ghazal-3

वो मसीहा क़ब्र पर आता रहा
मैं मुए पर रोज़ जी जाता रहा

ज़िन्दगी की हमने मर-मर के बसर
वो बुत-ए-तर सा जो तरसाता रहा

वाह, बख्त-ए-ना-रसा![1] देखा तुझे
नामाबर[2] से ख़त कहीं जाता रहा

राह तकते-तकते आख़िर जाँ गयी
वो तग़ाफ़ुल-केश[3] बस आता रहा

दिल तो देने को दिया पर हम-नशीं[4]
हाथ मैं मल-मल के पछताता रहा

देख उसको हो गया मैं बे-ख़बर
दिल यकायक हाथ से जाता रहा

क्या कहूँ किस तरह फुरक़त[5] में जिया
ख़ून-ए-दिल पीता तो ग़म खाता रहा

रात भर उस बर्क़-ए-दुश[6] की याद में
सेल-ए-अश्क[7] आँखों से बरसाता रहा

ढूँढता फिरता हूँ उसको जा-ब-जा[8]
दिल ख़ुदा जाने किधर जाता रहा

उस मसीहा की उमीद-ए-वस्ल[9] में
शाम जीता सुबह मर जाता रहा

इश्क़ का 'राना' मरज़ है ला-दवा[10]
कब सुना तूने कि वो जाता रहा

(1. फूटी क़िस्मत; 2. डाकिया; 3. लापरवाह/नज़रअंदाज़ करने वाला; 4. साथी; 5. जुदाई; 6. बिजली की तरह क्षणिक रूप से नज़र आने वाला; 7. आँसुओं की सैलाब; 8. इधर-उधर; 9. मिलने की उम्मीद; 10. जिसकी कोई दवा न हो)

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