Monday, August 7, 2017

Ghazal-6

पिसे हैं दिल ज़्यादातर हिना[1] से
चला दो गाम[2] भी जब वो अदा से

वो बुत आए इधर भी भूल कर राह
दुआ ये माँगता हूँ मैं ख़ुदा से

हिजाब उसका हुआ शब मअनी-ए-दीद[3]
नक़ाब उल्टी न चेहरे की हया से

इशारा ख़ंजर-ए-अबरू[4] का बस[5] था
मुझे मारा अबस[6] तेग़-ए-जफ़ा[7] से

बहुत बल खा रही है ज़ुल्फ़-ए-जानाँ[8]
बचेगी जान क्यूँकर[9] इस बला से 

है बेहतर इक करिश्मे में हों दो काम
मदीने जाऊँ राह-ए-कर्बला से

ख़ुदा जब बे-तलब[10] बर[11] लाए मक़सद
उठाऊँ क्यूँ न हाथ अपने दुआ से

'निज़ाम' अब उक़दा-ए-दिल[12] क्यूँ न हल हों
मुहब्बत है तुझे मुश्किल-कुशा[13] से

(1. मेंहदी; 2. क़दम; 3. दर्शन की तरह; 4. ख़ंजर जैसी भौंहें; 5. काफ़ी; 6. बेकार/फ़िज़ूल में; 7. बेवफ़ाई की तलवार; 8. प्रियतमा की ज़ुल्फ़; 9. कैसे; 10. बग़ैर मांगे; 11. पूरा करना; 12. दिल का मसअला; 13. मुश्किल दूर करने वाला)  

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